पर्यावरण के प्रहरी एजेटी जॉनसिंह को अंतिम विदाई

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7 जून, 2024 को बेंगलुरु में भारतीय वन्यजीव विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण क्षति हुई, जब प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह का 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से भारतीय वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को गहरा आघात लगा है, खासकर ऐसे समय में जब पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह: जीवन और योगदान

असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह ने अपने जीवन को वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित कर दिया था। उनका कार्यकाल कई दशकों तक फैला रहा, जिसमें उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं और शोध कार्यों के माध्यम से भारतीय वन्यजीव संरक्षण को नए आयाम दिए। जॉनसिंह का प्रमुख योगदान न केवल वैज्ञानिक शोध तक सीमित था, बल्कि उन्होंने जमीनी स्तर पर संरक्षण प्रयासों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वन्यजीव संरक्षण में उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ

जॉनसिंह का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय बाघ और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण में था। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य बाघों की आबादी को संरक्षित और पुनर्स्थापित करना था। उनके प्रयासों की वजह से कई बाघ अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए, जो आज भी भारतीय वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

इसके अलावा, जॉनसिंह ने कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों, जैसे कि एशियाई हाथी, भारतीय गैंडा और हिमालयी वन्यजीवों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदायों को संरक्षण के प्रयासों में शामिल करने के लिए कई कार्यक्रमों की शुरुआत की। उनके नेतृत्व में चलाए गए कार्यक्रमों ने स्थानीय समुदायों को वन्यजीवों के महत्व के बारे में जागरूक किया और उनके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी दृष्टि

जॉनसिंह की दृष्टि केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे पर्यावरण संरक्षण को एक समग्र दृष्टिकोण से देखते थे। वे मानते थे कि वन्यजीवों का संरक्षण तभी संभव है जब उनके प्राकृतिक आवासों को भी संरक्षित किया जाए। उनके कार्यों में हमेशा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और स्थायी विकास को बढ़ावा देने की दृष्टि शामिल थी।

निधन और भविष्य की चुनौतियाँ

जॉनसिंह का निधन भारतीय वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बड़ी क्षति है। उनकी अनुपस्थिति में, भारतीय वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। पर्यावरण परिवर्तन, मानवीय हस्तक्षेप, और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का क्षरण, ये सभी चुनौतियाँ पहले से ही बहुत गंभीर हैं। ऐसे समय में जब भारत को अपने वन्यजीवों और पर्यावरण के संरक्षण के लिए दृढ़ और समर्पित नेतृत्व की आवश्यकता है, जॉनसिंह का निधन एक बड़ा आघात है।

निष्कर्ष

असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह ने अपने जीवन को भारतीय वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित कर दिया था। उनका निधन न केवल भारतीय वन्यजीव संरक्षण के लिए बल्कि वैश्विक पर्यावरण संरक्षण समुदाय के लिए भी एक बड़ी क्षति है। उनकी विरासत और योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा, और उनकी प्रेरणा से भविष्य में भी वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा और ऊर्जा मिलेगी। जॉनसिंह की अनुपस्थिति में, हमें उनके कार्यों और आदर्शों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि उनकी दृष्टि और सपने साकार हो सकें।

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