सुप्रीम कोर्ट की पहल लैंगिक समानता के लिए समिति का पुनर्गठन

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश की न्यायिक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। हाल ही में, इसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है जो न्यायपालिका की लैंगिक संवेदनशीलता और यौन उत्पीड़न के प्रति उसके दृष्टिकोण को सुधारने की दिशा में है। यह कदम सर्वोच्च न्यायालय की आंतरिक शिकायत समिति (GSICC) की स्थापना के तरीके में बदलाव करके उठाया गया है। इस पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य 2013 के यौन उत्पीड़न पर नियमों के अनुरूप न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को सुधारना और लैंगिक समस्याओं का समाधान करना है।

पुनर्गठन की प्रक्रिया

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में इस पुनर्गठन प्रक्रिया को संचालित किया गया। इस प्रक्रिया में न्यायमूर्ति हिमा कोहली को GSICC की अध्यक्ष चुना गया, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना को सदस्य और डॉ. सुखदा प्रीतम को सदस्य सचिव बनाया गया। इस पुनर्गठित समिति में कानूनी और शैक्षणिक ज्ञान का मिश्रण सुनिश्चित किया गया है, जो इसे अधिक प्रभावी बनाता है।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली की अध्यक्षता

न्यायमूर्ति हिमा कोहली की अध्यक्षता में GSICC का नेतृत्व निश्चित रूप से इस समिति को एक नई दिशा और दृष्टिकोण प्रदान करेगा। न्यायमूर्ति हिमा कोहली के पास कानून के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है, जो समिति को मजबूत और निष्पक्ष नेतृत्व प्रदान करेगा। उनकी अध्यक्षता में समिति का कार्य अधिक प्रभावी और संवेदनशील बनेगा।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और डॉ. सुखदा प्रीतम की भूमिका

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना को समिति का सदस्य चुना गया है। उनके कानूनी ज्ञान और अनुभव से समिति को लाभ होगा। इसके अलावा, डॉ. सुखदा प्रीतम को सदस्य सचिव बनाया गया है, जो शैक्षणिक क्षेत्र में अपने अनुभव के साथ समिति के कार्यों को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने में मदद करेंगी। यह मिश्रण समिति के कार्यों को निष्पक्ष और प्रभावी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

लैंगिक संवेदनशीलता का महत्त्व

न्यायपालिका में लैंगिक संवेदनशीलता और यौन उत्पीड़न के मामलों का समाधान करना न केवल न्यायपालिका के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह दिखाता है कि न्यायपालिका न केवल कानून और न्याय की रखवाली करती है, बल्कि वह सामाजिक न्याय और समानता की भी पक्षधर है। इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशील है।

यौन उत्पीड़न पर 2013 के नियम

2013 में यौन उत्पीड़न पर बनाए गए नियम न्यायपालिका और अन्य कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न को रोकने और इससे निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम थे। इन नियमों के अनुपालन में किए गए बदलाव न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। यह सुनिश्चित करना कि सभी सदस्य इन नियमों का पालन करें और एक सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करें, समिति की प्राथमिकता होगी।

निष्कर्ष

भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लैंगिक संवेदनशीलता और आंतरिक शिकायत समिति (GSICC) के पुनर्गठन का निर्णय एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम है। यह न केवल न्यायपालिका के भीतर लैंगिक समानता और सुरक्षा को बढ़ावा देगा, बल्कि यह समाज को भी एक मजबूत संदेश देगा कि यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई में न्यायपालिका अग्रणी भूमिका निभा रही है। न्यायमूर्ति हिमा कोहली, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और डॉ. सुखदा प्रीतम के नेतृत्व में, यह समिति न्यायपालिका में एक नई सोच और दृष्टिकोण को स्थापित करने में सफल होगी, जिससे न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में सुधार होगा और समाज में न्याय और समानता के मूल्यों को बढ़ावा मिलेगा।

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